पटना : होली का शुमार के साथ राजनीति शुमार भी प्रदेश वासियों पर चढ़ा। लेकिन महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर चल रहा खींचातान ने राजनीति रंग को फिका कर रखा है। राजनीतिज्ञों की दृष्टि हमेशा बिहार की राजनीति पर टिकी रहती है। देशकी आजादी का मसला हो या आजाद भारत में केन्द्र की सरकार का गठन। हमेशा बिहार की अहम भूमिका रही। 2014 का  लोकसभा चुनाव में एनडीए को मिली बहुमत से कांग्रेस, राजद समेत अन्य सभी दलों में खलबली मच गयी। भाजपा का देश में बढ़ते जनाधार से घबराये बिहार के राजनीतिक दलों ने साझा मंच करने को बेताब रहते गांधी मैदान में वाम दल ने रैली का आयोजन कर विपक्षी दलों को लाने का भरसक प्रयास किया। 

 

बिहार में नया महागठबंधन बना। इस महागठबंधन में एनडीए के रहे घटक दल हम-से. रालोसपा ने एनडीए का वॉय-वॉय कर शामिल हुए। वहीं भाजपा से अपने को दूरी बनाये रखने की बात करने वाली जदयू इस बार एनडीए के साथ चुनावी समर में कूदी है। 17-17-6 के फार्मूेले पर चुनावी समर में उतरी भाजपा को अपनी सीटिंग सीट घटक दल जदयू के खाते में देकर अपने ही दल के नेताओं की नाराजगी को सुलझाने में जुटना पड़ा। 

 

 

वहीं महागठबंधन के तरफ से सीटों की घोषणा नहीं होने से इनके नेताओं में बेचैनल तो छायी हुई है वहीं प्रदेश की जनता मौन साध राजनीति खेल देखने का इंतजार में बैठी है। महागठबंधन के घटक दलों में मालमेल न होते देख इन दलों के नेताओं के बीच आगे कुंआ पीछे खाई वाली कहावत सामने खड़ी है। क्योंकि चुनाव में टिकट पाने की होड़ मची होती है। सबों को टिकट की चाहत रहती है। अगर अपने दल से टिकट पाने में सफल न होते दिख बर्षाती मेढक की तरह तालाब बदलना शुरू कर देते हैं। इस बार प्रदेशवासियों पर होली का रंग तो चढ़ेगा, लेकिन नेताओं पर होली का रंग फिका ही रहेगा।


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