पटना: न्यायिक प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने के लिए विधि आयोगों के सिफारिशों को चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल करने हेतु पत्र द्वारा सभी राजनीतिक दलों से डा. जगन्नाथ मिश्र ने अपील करते हुए कहा है कि सम्प्रति देश में हजारों कानून हैं। ढेर सारे कालवाह्य हो चुके हैं। न्याय प्रक्रिया उनसे प्रभावित होती ही है। विधि आयोग ऐसे कानूनों को खंगालता भी है लेकिन कालवाह्य होने के कारण अनुकूल नहीं होता। विधि आयोग ने 1987 में प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर 50 जजों की जरूरत बताई थी। इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 2019 की परिस्थितियां भिन्न है। मुकदमे लगातार बढ़े हैं। न्याय दूर की कौड़ी बनता जा रहा है।

डा. मिश्र ने बताया कि न्यायपालिका के प्रति बेशक यहां आदर और विश्वास है। कार्यपालिका की आलोचना संभव है, होती भी है। कार्यपालिका संसद और विधानमंडल के प्रति भी जवाबदेह है। प्रशासनिक सेवाएं भी कार्यपालिका व विधायिका के प्रति जवाबदेही में है। भारत की सभी संवैधानिक संस्थाएं किसी न किसी स्तर पर जवाबदेह है, लेकिन न्यायपालिका आदरणीय होने के बावजूद जवाबदेह नहीं है। हम उसकी कार्यशैली का विवेचन नहीं कर सकते। हम उसकी स्थापनाओं व निर्णयों पर टिप्पणी भी नहीं कर सकते। मूलभूत प्रश्न यह है कि भारत के संविधान तंत्र का सर्वाधिक भरोसेमंद न्यायिक निकाय अपनी जवाबदेही का कोई तंत्र क्यों विकसित नहीं करता?  


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