पटना, (रिर्पोटर) : उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि प्रा. लि. कम्पनी की तरह चलने वाली पार्टियों के वारिसों में विरासत की जंग स्वाभाविक है। लालू प्रसाद के राजनीतिक आशियाने में धर के चिराग से ही आग लगी है। यूपी में मुलायम, कर्नाटक में देवगौड़ा, तमिलनाडु में करूणानिधि,हरियाणा में चैटाला या फिर महाराष्ट्र में पवार परिवार के वारिसों में छिड़ी विरासत की लड़ाई के बाद देश की जनता भला इनके राजनीतिक शगूफों पर क्यों भरोसा करें? जिस तरह से लालू प्रसाद ने छोटे बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए बड़े बेटे और बेटी को किनारे किया, उसकी प्रतिक्रिया देर-सबेर होनी ही थी। बड़े बेट की अपनी पत्नी से डायवोर्स के मुकदमे के बाद उसके ससुर को पार्टी का उम्मीदवार बनाना न केवल अपमानित करना बल्कि उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा भी है। बड़ी बेटी को स्टार प्रचारक की सूची से बाहर कर औकात बताई गयी। लालू प्रसाद लाख कोशिश कर लें, वारिसों के सत्ता संघर्ष को रोक नहीं सकेंगे।यूपी में बाप-बेटे और चाचा-भतीजे की लड़ाई में दल के बंटवारे का खेल पूरा देश देख चुका है। महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार और भतीजे अजीत पवार तथा बेटी सुप्रिया सुले के बीच सियासी खींचतान व मनमुटाव जगजाहिर है। कर्नाटक मंे वारिसों के बीच जारी जंग में ही एक साथ देवगौड़ा को अपने दो पोते निखिल व प्रज्वल कुमारस्वामी को लांच करने के लिए विवश होना पड़ा है। तमिलनाडु में भी स्टालिन व कनिमोझी में ठनी रहती है। हरियाणा में ओमप्रकाश चैटाला के दोनों बेटों को अपनी पार्टी को विखंडित करने से भी परहेज नहीं रहा।ऐसे में देश लोकतांत्रिक तरीके से संचालित 11 करोड़ कार्यकर्ताओं की पार्टी भाजपा को क्यों न अपनाएं?


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