पटना, (रिर्पोटर) :  संसदीय चुनाव में लालू प्रसाद का असर 10 साल पहले ही खत्म हो चुका है। वे जेल में रहें या जमानत पर छूटें, इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। जनता उनके 15 साल के कुशासन को देख चुकी है। 2009 के संसदीय चुनाव में राजद को बिहार की 40 में से केवल 4 सीटों पर सफलता मिली थी। लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहने के बावजूद राबड़ी देवी को शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी, जबकि एनडीए ने 32 सीटें जीती थीं। 2014  में भी लालू प्रसाद को 4 सीट से ही संतोष करना पड़ा। जेल से बाहर रह कर भी वे बेटी मीसा भारती को नहीं जिता पाए थे। चारा घोटाले के चार मामलों में सजायाफ्ता होने के कारण लालू प्रसाद जेल में हैं और अब वे मुखिया का भी चुनाव नहीं लड़ सकते।  उन्हें जमानत मिलना न मिलना कोर्ट के फैसले पर निर्भर है। इसमें मतदाताओं की कोई रुचि नहीं हैं।वे जनता के किसी मुद्दे पर नहीं, बल्कि अपने घोटालों के कारण जेल की सजा काट रहे हैं, लेकिन उनकी पार्टी सहानुभूति पाने के लिए घोटालों के एक गुनहगार को पीड़ित बताने में लगी है। लालू प्रसाद जमानत पाने के लिए कभी गंभीर बीमारी को आधार बनाते हैं, तो कभी पार्टी प्रमुख के नाते प्रचार करने के लिए रिहाई चाहते हैं। गंभीर रूप से बीमार हैं, तो प्रचार कैसे कर सकते हैं? उनकी दलीलों पर अदालत जो भी फैसला करे, जनता ने बुझी हुई लालटेन को किनारे रखने का फैसला कर लिया है।


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