सनातन धर्म में होने वाले सभी प्रकार के पूजा-पाठ में धूप दी जाती है। इसे धूप जलाना भी कहा जाता है। पूजा-पाठ के दौरान धूप क्यों दी जाती है? इस सम्बन्ध में अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि शास्त्रों में धूप के बारे में उल्लेख किया गया है। यहाँ धूप जलाने का तात्पर्य प्राकृतिक धूप से है। यानी गाय के गोबर से बना उपला (गोयठा) धूपदानी में कर्पूर के साथ जलाकर उसमें धूमन और  गुगूल डालकर धूप देने का शास्त्र सम्मत विधान है। धूप देने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा  का प्रवाह होता है। इससे घर के माहौल में शान्ति और समृद्धि होती है और परिवार के सदस्य आपस में मिल-जुलकर रहने की भावना जागृत होती है। इसके प्रभाव से आस-पास के वातावरण में हानिकारक कीटों का प्रभाव कम होता है। इससे उस स्थान पर रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। धूप जलाने से सौभाग्य आने की बात भी कही गई है। कहते हैं कि धूप देने से व्यक्ति आकस्मिक दुर्घटनाओं से बचकर रहता है और भाग्य साथ देता है। धूप देने से घर का वास्तु दोष भी दूर होता है। घर में वास्तु दोष की वजह से आने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से धूप देने से व्यक्ति की जन्मकुंडली के ग्रह  दोष दूर होते हैं और जन्मकुंडली में नौ ग्रहों की स्थिति में सुधार होता है।


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