पटना, (रिर्पोटर) : भाजपा के बिहार प्रभारी भूपेन्द्र यादव ने फेसबुक पर पोस्ट कर लिखा  कि चुनावी राजनीति में वंशवाद के कितने दुष्परिणाम होते हैं, ये कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को देखकर समझा जा सकता है। जो भाषा वो चुनाव में इस्तेमाल कर रहे हैं और जिस प्रकार के गलत तथ्यों का वे प्रयोग कर रहे, उस पर आज उच्चतम न्यायालय को जवाब मांगना पड़ा है। एक दौर था जब अटल जी विपक्ष के नेता हुआ करते थे तो वे सत्तापक्ष पर तीखे से तीखा प्रहार किया करते थे। लेकिन उनके प्रहार में भी भाषाई शुचिता और मर्यादा होती थी। उसमें कविता का सौंदर्य होता था। उसमें जो आलोचना थी, वो आलोचना तथ्यों के आधार पर सरकार की गलत नीतियों को उजागर करने का सामथ्र्य रखती थी।

श्री यादव ने बताया कि चुनाव में संवाद का बहुत महत्व होता है और संवाद का अर्थ ये है कि आप अपने विचारों को कितनी स्पष्टता के साथ रख पाते हैं। उसमें तीखापन हो सकता है, लेकिन मर्यादा भी होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश वंशवाद की राजनीति से आने वाले नेता न तो राजनीति की जमीनी भाषा को समझते हैं और न ही संवाद की कला को। राजनीति में जब तक लोग परिवार के नामपर थोपे जाएंगे तबतक राजनीति में भाग लेकर राष्ट्र-निर्माण करने वाली युवा प्रतिभाओं को मौका नहीं मिलेगा।

अगर देखा जाए तो लगभग राहुल गांधी जैसी ही भाषा बिहार में तेजस्वी यादव भी बोलते हैं।  अपने आपको एक वोट बैंक का वारिस मानकर उसके आधार पर गठबंधन और सियासी जोड़तोड़ कर लेना एक किस्म का राजनीतिक सामंतवाद है, जो इन परिवारवादी दलों के कारण राजनीति की फितरत बन गयी है। यही हाल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का भी है। सपा के नेता आजम खान ने जया प्रदा जी के लिए अशोभनीय टिप्पणी की और अखिलेश यादव मंच पर बैठे मुस्कुराते रहे। एकबार भी आजम खां को नहीं टोका। जो आजम खान उनको सत्ता में हमेशा आंखे दिखाया करते थेय जो आजम खान उनके पिता को भी चुनौती देते रहे, उन्हें अखिलेश यादव मंच पर ऐसी अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने पर टोक नहीं सके। ये दिखाता है कि वंशवाद से राजनीतिक संवादहीनता तो होती ही है, कमजोर नेतृत्व भी पैदा होता है। ऐसा नेतृत्व जो महिलाओं का सम्मान नहीं कर पाता और उनका अपमान करने वाले को कुछ नहीं कह पाता। इस देश में लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले बाबा साहेब अंबेडकर, डा. राम मनोहर लोहिया, दीन दयाल उपाध्याय जैसे लोगों की विचारधारा ने समाज के निम्न वर्गों से लोगों ऊपर उठाने वाली राजनीति की दिशा दी है। आज वंशवाद राजनीति के लि, कितना बड़ा खतरा है, वंशवाद राजनीति में प्रतिभाओं को कैसे रोकता है, इसके खिलाफ युवाओं को जागने की जरूरत है। हमें लोकतंत्र को बचाने के लि, जो पार्टियां वंशवाद के कारण लोकतंत्र को कुचलने में लगी हैं, नाम वोटबैंक का लेती हैं लेकिन एक परिवार के अलावा किसीका भला नहीं करतीं, उनको सबसे पहले हराने की जरूरत है। उनके महागठबंधन को हराने की जरूरत है।



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