हमारे सनातन धर्म में वर्ष के 365 दिन पूजा-पाठ, दान इत्यादि के लिए महत्वपूर्ण है। किन्तु तीन सौ पैंसठ दिनों में कुछ तिथियाँ अति-महत्वपूर्ण है। इनमें अक्षय तृतीया विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस सम्बन्ध में अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने बतलाया कि अक्षय का शाब्दिक अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो अथवा जो स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा  सत्य है। सत्य केवल परमात्मा ही है। जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि श्रीपरशुराम जी का जन्म दिवस होने के कारण परशुराम तिथि भी कही जाती है। चारों युग में से त्रैता युग का आरम्भ इसी तिथि से हुआ है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 07 मई 2019 (मंगलवार) को है। पौराणिक व शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन किया गया गंगा स्नान, दान, जापा व पूजा-अर्चना अक्षय रहती है। हमारे यहाँ अक्षय वट, अक्षय पात्र की अवतारणा है। अक्षय वट वर्तमान में प्रयाग राज्य में तथा अक्षय पात्र महाभारत काल में द्रौपदी के पास था। अक्षय वट से किसी प्रकार का मनोकामना किया जाय तो पूर्ण होती है, वहीं अक्षय पात्र रिक्त नहीं होता। हमारे  देश में आन्ध प्रदेश के विशाखा पटनम् जिले के सीमाचलन में नरसिंह भगवान का विश्व विख्यात मन्दिर है। विग्रह पर पूरे वर्ष प्रतिदिन चन्दन का लेप किया जाता है और अक्षय तृतीया के दिन ही चन्दन आवेष्ठित प्रतिमा में स्वत: अग्नि प्रज्वलित हो जाती है और फिर अक्षय तृतीया के दूसरे दिन से पुनः चन्दन का लेप आरम्भ हो जाता है। इस दिव्य दृश्य और भगवान नरसिंह की कृपा प्राप्त करने के लिए लाखों के संख्या में भक्त पहुँचते हैं। विशेषत: मिथिलांचल में इस दिन शर्बत पीलाया जाता है तथा मिट्टी का घड़ा दान किया जाता है। अतः समस्त सनातन धर्मावलंबियों को चाहिए कि इस पुनीत अवसर का उपयोग अपने, परिवार व समाज के कल्याण के लिए अवश्य करें।

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