हिन्दू हितैषी बनकर सामने रही भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो हजार चौदह के चुनाव प्रचारों से लेकर लगातार संसद के भीतर और बाहर कई बार खुद को पिछड़ी जाति का खुलकर बताने में कोई संकोच नहीं किया। हालांकि विश्लेषकों और विरोधियों ने यह कहकर मोदी की आलोचना करते हुए उन्हें निशाना बनाने की कोशिश की और कहा - वे ऐसा कर प्रधानमंत्री पद की गरिमा को तार - तार कर रहे हैं। इन सबसे बेपरवाह मोदी अपने रास्ते पर चलते रहे क्योंकि वे इसके सियासी मायने को समझ बुझ कर ही ऐसा कर व कह कर रहे थे। हाल ही में एक बहस के दौरान प्रधामंत्री मोदी ने संसद के भीतर विपक्ष को जवाब देते हुए कहा मैं पिछड़ी जाति में पैदा हुआ एक गरीब मां का कामदार बेटा हूँ। इसलिए मुझे नामदार लोग स्वीकार व बर्दास्त नहीं करते। अलबत्ता उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। भाजपा अध्यक्ष अमीत शाह भी प्रधानमंत्री मोदी को उनकी जाति और ओबीसी बताकर सार्वजनिक रूप से कई बार इसका उदघोष करते रहे हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव दो हजार पंद्रह के समय बाँका जिले की एक जनसभा में नरेंद मोदी की जाति का उल्लेख करते हुए कहा की मोदी भाजपा के सेनापति हैं जो अतिपिछड़ें वर्ग से आते हैं। बाद में उन्होंने अपने ऑफिशियल ट्वीटर हैंडल से भी इस बात का जिक्र करते हुए ट्वीट किया और कई मंचो से कहते रहे हैं। वगैरह वगैरह ! फिर 2019 के चुनाव प्रचार में बड़ी चतुराई से यूपी के कन्नौज में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के लोकसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में आयोजित रैली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा मैं पिछड़ा ही नहीं अतिपिछड़ा हूँ। नरेंद्र मोदी, भाजपा और जदयू ने पिछडों के भीतर की सबसे बड़ी संख्या वाले यादवों को राजद और सपा के खाते में छोड़ते हुए, बिहार - उत्तर प्रदेश सहित देश भर में पिछड़ों के भीतर करीब पैंतीस से चालीस फ़ीशदी आवादी वाली अतिपिछड़ी जातियों को अपना लक्ष्य बनाया। जिसे इसके पूर्व किसी भी दल ने मतदाता के तौर पर भी अलग से फोकस नहीं किया था। इसी फोकस ने दो हजार सतरह में यूपी के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा फायदा पहुचाया था जिसका आंकलन बखूबी बीजेपी ने किया भी होगा।

   यही कारण है कि पूरे हिंदी पट्टी को ध्यान में रखते हुए बिहार और यूपी में अतिपिछड़ी जातियों को उनके बड़ी संख्या के अनुरूप तो नहीं परन्तु कुछ सीटों पर ही सही अतिपिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को भी भाजपा अथवा उनके सहयोगी दलों ने मैदान में उतारा जिन जाति के पृष्ठभूमि वाले लोगों को इससे पहले नहीं उतारा जाता रहा है। इसके पूर्व धर्म के भीतर जाति को साधने की पुरी रणनीति के साथ जंग लड़ रही भाजपा ने जहां दस प्रतिशत गरीब सवर्ण आरक्षण प्रदान कर अगड़ों को अपनी तरफ आकर्षित रखा वहीं थर्टीन प्वाइंट रोस्टर पर अध्यादेश लाकर विश्वविद्यालयों में चल रहे ओबीसी,एस. सी.एसटी. आंदोलन को ठंढा किया और अनुसूचित जाति अत्याचार अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अध्यादेश के तहत पुनः स्थापित कर भारत बंद से सुलगी आग को भी शांत करने में जो मुस्तैदी दिखाई उससे यह स्पष्ट होता है कि सबके साथ दोस्ती बनी रहे अथवा नहीं संतुलन तो कमसे कम बाहरी तौर पर ही सही जरूर दिखती रहे, ऐसा लगता है भाजपा और मोदी शाह की जोड़ी इसी रणनीति पर आगे बढ़ते रही।

         पुलवामा आतंकी हमले को लेकर पाकिस्तान में हुए एयर स्ट्राईक के बाद राष्ट्रवाद के मुद्दे ने मोदी - शाह के प्रचार रथ में जुड़े एक मजबूत पहिये की तरह काम किया। तभी तो नरेंद्र मोदी चुनाव आदर्श आचार सहिंता की परवाह किए बगैर चुनावी मंच से ही यह कह गए कि पहला वोट पुलवामा के शहीदों के नाम होना चाहिए। उन्हें इसका पूरा इल्म था कि उनका ऐसा कहना आम जनों के भावनाओं को स्पर्श करने वाला हो सकता है। ऐसा ही हुआ प्रतीत भी होता है। ऐसे भी चुनाव आदर्श आचार संहिता उलंघन मामले में अब तक किसी राजनेता को किसी न्यायालय से किसी भी तरह की सजा अथवा दोषसिद्धि हुई हो ऐसा कोई उदाहरण भी शायद नहीं मिलता। तमाम तरह के मीडिया और भाजपा के प्रचार तंत्र ने इन सबके प्रचार में पुर जोर भूमिका निभाई। खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया भी किन्हीं कारणों से विकास, बढ़ती बेरोजगारी, महँगाते डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, कालाधन, कृषि समस्या, किसान आत्म हत्या, सहित दर्जनों मुद्दे और सुलगते सवाल को उठाते हुए कम ही नजर आई। नाहीं पक्ष अथवा विपक्ष ने इन गम्भीर विषयों को मुद्दों बना सकने में सफलता हाशिल की। हालांकि विपक्ष ने और ख़ासकर काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसकी पुरजोर कोशिश जरूर की जबकि दो हजार चौदह के आम चुनाव में इन्हीं मुद्दे के शोर भाजपा और नरेंद्र मोदी की ओर से ज्यादा सुनाई पड़ रहे थे।

         अंत मे भाजपा की तरफ से यह कहना की इस चुनाव में जातियों की बेड़िया टूट गई है यह उनके प्रचार - प्रोपगेंडा का हिस्सा हो सकता है पर जमीनी सचाई इससे परे है। अब देखना होगा की एक बार फिर से विपक्ष का दर्जा प्राप्त करने को सांसदों की संख्या तक नहीं पहुच पाने वाली कांग्रेस पार्टी और दूसरे विपक्षी दल किस प्रकार से जनता के मूल मुद्दों की लड़ाई लड़ने के लिए खुद को तैयार करते हैं। क्योंकि एक मजबूत विपक्ष का होना भी बेहद जरूरी है।

मंजीत आंनद साहू                                                                                                                                       युवा कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष

Share To:

Post A Comment: