पटना, (रिर्पोटर) : भले देश में अन्य भाषाओं की तरह अंग्रेज़ी पढ़ाई जाएकिंतु भारत की सरकार की राजकीय कार्यों की भाषा केवल 'हिन्दी'हीं हो सकती है। देश मेंदेश की किसी भाषा का 'राजभाषा'न होनादेश के प्रत्येक नागरिक के लिए लज्जा और अपमान का विषय है। ग़ुलाम भारत की सरकार की भाषा अंग्रेज़ी थीक्योंकि राजा अंग्रेज़ था और राज की भाषाराजा की भाषा होती है। किंतु अब जब देश स्वतंत्र हैहम अभी तक देश की किसी भाषा को इतना समर्थ नहीं बना सके कि वह देश की 'राजभाषा हो सके यह एक ऐसा प्रश्न है ,जो देश का हर एक देशभक्त युवा भारत की सरकार से पूछना चाहता है।

ऐसी और इसी तरह की अनेक बातें गत रविवार की संध्याबिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में संपन्न हुई राष्ट्रीय युवा संगोष्ठी मेंदेश के प्रायः सभी प्रांतों से पहुँचे युवा साहित्यकारों ने कही। सम्मेलन द्वारा आयोजित शताब्दी-सम्मान समारोह के पश्चात आयोजित इस संगोष्ठी का विषय था 'राजभाषा के संबंध में भारत के युवाओं के विचार'

अरुणाचल से आइं युवा हिन्दी सेवी डा तुंबम रीबा लीली ने कहा उत्तर-पूर्व के राज्यों में ख़ूब मनसे हिन्दी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है।'हिन्दीहमारी रोज़ी-रोटी है। हम हिन्दी की सेवा क्या करेंगे,हिन्दी हीं हमारा भरण-पोषण और सेवा कर रही है। अरुणाचल के लोग हिन्दी के प्रति माँ के समान श्रद्धा रखते हैं। देश की राजभाषा हिन्दी हीं होनी चाहिए। 

अंडमान निकोबार के युवा साहित्यकार डा डी अभिषेक ने कहा कि हिन्दी के बारे में राजनीति करने वाले लोग हीं भ्रम फैलाते हैं। हिन्दी को बड़े प्यार से दक्षिण-भारत और उत्तर-पूर्व में प्रसारित किया जा सकता है,किया जा रहा है। भ्रम फैलाने वाले लोगों के कारण हीं दक्षिण में 'हिन्दी'की प्रगति बाधित हो रही है। सभी विचारवान लोग अंग्रेज़ी की बाध्यता के विरोधी हैं। संगोष्ठी में डा अनुशब्द (असम),डा दीपा गुप्ता (आंध्र प्रदेश), डा नुकफाँटी जमातिया त्रिपुरा),सिल्बी पाशा (मेघालय),छुकी लेप्चा और अर्जुन राई चामलिंग 'यावा' (सिक्किम), डा ललमुआनओमा साइलो (मिज़ोरम)तथा डा मोनिका शर्मा(उत्तर प्रदेश)ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय युवा कवि-सम्मेलन भी अभूतपूर्व रहा। यह देश का पहला ऐसा कवि-सम्मेलन थाजिसमें देश के सभी प्रांत से युवा कवि एवं कवयित्रियों ने अपनी मज़बूत उपस्थिति दीतथा अपनी एक से बढ़कर एक हिन्दी गीत-ग़ज़लों का पाठ कर श्रोताओं को चकित और भाव-विहवल कर दिया।

दिल्ली पुलिस में अधिकारी और राष्ट्रीय ख्याति के युवा कवि मनीष मधुकर ने जब कहा कि "डूब के तेरी आँखों में अब खोना सीख रहा हूँ मैंप्यार मुहब्बत वाला जादू टोना सीख रहा हूँ मैंतू पारस हैमैं पत्थर हूँ,लेकिन तुमसे मिलकर अब धीरे-धीरे तेरे जैसा होना सिख रहा हूँ मैंतो खचाखच भर सम्मेलन-सभागार तालियों से गूँज उठा। छतीसगढ़ की कवयित्री ने डा प्रियंका त्रिपाठी ने श्रींगार की इस पंक्ति से सबका दिल मोह लिया कि, “भीषण तपिश में सर्द हवा के झोंकों सा आए/आख़िर कौन हो तुम?”

कोलकाता के युवा कवि सुब्रत घोष ने कहा"मथुरापुरी का मुख्य द्वार पर एक दिन रहे सुप्तनगर की नटी उर-वसी अभिसार पथ पर चल पड़ी"। तमिलनाडू की कवयित्री वी गीता मालिनी ने कहा "यह रीत नया हैया पुराने का उलटायह तो समय बताएगाक्योंकि आज का ज़माना कल फिर बदल जाएगा।"

चेन्नई की डा के गौरी का कहना था कि।"जैसे जड़ के बिना पेंड नहींमाँ के बिना परिवार नहींनारी के बिना समाज नहीराष्ट्र-भाषा बिना देश नहींऔर हिन्दी के बिना हम नहीं"। महाराष्ट्र से आईं कवयित्री डा अर्चना पाठ्या ने कहा "आज हिन्दी-दिवस पर मुझे फिर विचार आयामिली तो हिन्दी ने पय्यार से बिठाया/दर्द अपना मुझे कुछ इस तरह सुनायाएक फीकी हाँसी के साथ मेरी ओर देख अपने दर्द की पूरी दासतां सुनाई।"

हरियाणा के चर्चित युवा कवि विकास यशकीर्ति ने कहा कि, “दर्द का दरिया हमारागहरा समंदर हो गया

कवयित्री अरुणा डोगरा शर्मा ने शहूदों को याद करते हुए कहा कि "वतन के लिए मर-मिटे जो वीरवो हमेशा याद आएँगेशहीदों की शहादत को कभी न भूल पाएँगे"। आंध्रप्रदेश से आए युवा कवि परवीन प्रणव ने कहा- “मैं कश्मकश में हूँ बहुतकि चुप रहूँ या बोल दूँओढ़े रहूँ ख़ामोशी या फिर अब राज सारे खोल दूँ।

डा भगवती (जम्मू),डा प्रमिला मिश्र,सुभाष पाठक जिया(मध्यप्रदेश),सरिता शर्मा कुंद्रा(चंडीगढ़), प्रेरणा प्रताप (राजस्थान),आलोक शर्मावर्षा गुप्ताआकाश उपाध्याय'शब्दाकाश', पंकज त्यागी असीम डा र्राज कुमार उपाध्ययाय मणिडा दीप्ति जोशी गुप्ता (उत्तर प्रदेश), प्रज्ञा मिश्र (महाराष्ट्र),सल्तनत पंवारडा अखिलेश शंखधरवाइखोम चीख़ैगमा मणिपुर),चैतन्य चंदन (दिल्ली),डा लता मानकरआलोक शर्मालता प्रासर,सिंधु कुमारीडा राधा शैलेंद्रचाँदनी समरनेहा नुपुर,हेमा सिंहमुकुंद मुरारी रामआस्था दीपालीनंदिनी प्रनयसीमा गुप्ता समेत ८१ कवियों और कवयित्रियों ने काव्य-पाठ किया। मंच का संचालन आचार्य आनंद किशोर शास्त्री ने किया। 

इस अवसर पर साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ,उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्तप्रो शशि शेखर तिवारीडा भूपेन्द्र कलसीडा मधु वर्माडा कल्याणी कुसुम सिंहबीरेन्द्र कुमार यादवप्रो वासुकी नाथ झा, योगेन्द्र प्रसाद मिश्र  आदि सकड़ों की संक्या में प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे।


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