नई दिल्ली, (रिर्पोटर) :  बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने आज नई दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेन्टर के इमली हॉल में कंफेडरेशन ऑफ इण्डियन इंडस्ट्री (सी.आई.आई.) द्वारा सीड टेक्नोलॉजी इनोवेशन फॉर सस्टनेबल राईस प्रोडक्शन विषय पर आयोजित सेमिनार का उद्घाटन किया।

 श्री कुमार  ने इस सेमिनार में अपने सम्बोधन में कहा कि देश में लगभग 43.86 मिलियन हे. में धान की खेती की जाती है तथा बिहार में औसतन 3.31 मिलियन हे. में धान की खेती होती है। देश में चावल का कुल उत्पादन 104.80 मिलियन टन है, जबकि इसकी उत्पादकता 23.90 क्विंटल प्रति हे. है। बिहार में चावल का उत्पादन राज्य की परिस्थिति विशेषकर बाढ़ एवं सुखाड़ के अनुसार घटता या बढ़ता है तथा सामान्य मौसम में उत्पादन 8.0-8.2 मिलियन टन के बीच में रहता है। लेकिन बाढ़ एवं सुखाड़ की स्थिति में उत्पादन 6.2-6.8 मिलियन टन के बीच में प्राप्त होता है। इसी प्रकार, मौसम का असर उत्पादकता में भी देखने को मिलता है। सामान्य मौसम में उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से अधिक 24 क्विंटल प्रति हे. से अधिक तक जबकि आपदा की स्थिति में उत्पादकता घटकर 20 क्विंटल प्रति हे. के आस-पास रहती है।

 मंत्री ने कहा कि देश के 6 बड़े धान उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश तथा बिहार है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2012 में चावल के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए बिहार को कृषि अर्मण अवार्ड से पुरस्कृत किया गया है। राज्य के कृषि विश्वविद्यालय, अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान तथा केन्द्रीय चावल अनुसंधान केन्द्र के साथ समन्वय कर राज्य की परिस्थिति के अनुसार बाढ़ की स्थिति में धान के स्वर्णा सब-1 तथा सुखाड़ की स्थिति में सहभागी एवं शुष्क सम्राट प्रभेद किसानों को उपलब्ध कराया गया है। साथ ही, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर द्वारा विकसित कम पानी में उपजाये जाने वाले प्रभेद यथा सबौर सुरभित, सबौर अद्र्धजल, सबौर दीप किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। बिहार सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में मध्यम एवं ऊंची जमीन में जीरो टिल सीड ड्रिल मशीन के माध्यम से धान की सीधी बुवाई को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए केन्द्र प्रायोजित एवं राज्य पोषित योजनाओं से फसल प्रत्यक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। धान की सीधी बुवाई के फसल कटनी के आंकड़ों को भी अलग से संधारित करने का निदेश दिया गया है। धान की सीधी बुवाई के साथ रेज बेड प्लांटर के द्वारा मक्का की खेती पर भी विशेष बल दिया जा रहा है। बाढ़ एवं सुखाड़ की स्थिति में धान की सामुदायिक नर्सरी हेतु प्रखंडों में किसानों का चयन कर उन्हें अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। सामुदायिक नर्सरी में तैयार पौध को जरूरतमंद किसान को मुफ्त में उपलब्ध कराने की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है।

डॉ. कुमार ने कहा कि बिहार में कुल आच्छादन क्षेत्र के अनुसार 6.6 लाख क्विंटल धान के बीज की आवश्यकता है। 40 प्रतिशत बीज प्रतिस्थापन दर के अनुसार राज्य को प्रतिवर्ष 2.64 लाख क्विंटल धान के बीज की आवश्यकता है। राज्य के बीज गुणन प्रक्षेत्रों तथा बिहार राज्य बीज निगम से सम्बद्ध किसानों के माध्यम से 65,000 क्विंटल बीज की आपूर्ति राज्य स्वयं कर पाता है। शेष बीज की आपूर्ति विभिन्न बीज कम्पनियों द्वारा विपणन के माध्यम से की जाती है। सरकार द्वारा बिहार में धान के बीज का लगभग 300 करोड़ रूपये का वार्षिक विपणन किया जाता है। इस प्रकार बिहार में धान के गुणवत्तापूर्ण बीज के विपणन की असीम सम्भावनायें हैं। उन्होंने कहा कि मैं यहां उपस्थित बीज उद्योग से जुड़े उद्यमियों, विभिन्न कम्पनी के प्रतिनिधियों से अपील करना हूँ कि बिहार में बीज उत्पादन तथा प्रसंस्करण के लिए आगे आयें और इसके लिए सरकार आपको हरसंभव सहायता उपलब्ध कराएगी।

Share To:

Post A Comment: