भागलपुर, (रिर्पोटर) :वर्ष के बारह महीनों में शरद पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पं. आर. के. चौधरी उर्फ बाबा, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बताया कि शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को यह देखने के लिए निकलती है कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन्य-धान्य से भरपूर करती है। शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है यानी लक्ष्मी जी पूछती है कौन जाग रहा है? अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है इसलिए इस महीने का नाम अश्विनी पड़ा है। एक महीने में चंद्रमा जिन सताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें यह सबसे पहला है और आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है। केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है तथा पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट हो जाता है। चंद्रमा की किरणों से इस पूर्णिमा की रात्रि में अमृत बरसता है।  हर वर्ष की भांति इस वर्ष शरद पूर्णिमा 13 अक्टूबर 2019 को है। पुरानोक्त  मान्यतानुसार इस पूर्णिमा को पूजा-पाठादि की शुरुआत प्राचीन काल में ही हुई थी।
आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। जीवनदायिनी रोग नाशक जड़ी बूटियों को शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी.बूटियों से जब दवा बनाई जाती है तो वह रोगी के ऊपर शीघ्र प्रभावी होता  है। चंद्रमा को वेद, पुराणों में मन के समान माना गया है। ष्चन्द्रमा मनसो जाताश्चक्षो सूर्यो अजायत। श्रोत्रांवायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत।ष्
वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है।  प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधिष यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है। ब्रह्म पुराण के अनुसार सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधिष सोलह कला संपूर्ण हो तो उस दिन औषधियों को अत्यधिक बल मिलता है। शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है। लेकिन इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं।
स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधारानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं। कहते हैं जब वृंदावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी खासकर उत्तर-पूर्व भारत में यह पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है तथा बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र और झारखंड के कई जिलों में विशेष उत्सव के रूप में मनाते हैं। गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो लोग  महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। उड़ीसा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। देवाधिदेव महादेव और देवी मां पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का अवतरण इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुमारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती है। शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है, जब वर्षा ऋतु अंतिम पड़ाव पर तथा शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है। इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।

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