पटना, (रिर्पोटर) : बिहार विधानसभा के शीतकालीन सत्र के तीसेर दिन आज विधानसभा में एनआरसी को राकने के लिए भाकपा माले के विधायक महबूब आलम, उपनेता सत्यदेव राम, सुदामा प्रसाद के समर्थन में राजद नेता ललित यादव एवं सभी विधायक, कांग्रेस के संचेतक राजेश राम, शकील अहमद समेत सभी विपक्षी विधायक बेल पर आ गये और एनआरसी रोकने की मांग करने के बाद विधानसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव लेकर आया ताकि इस पर बहस हो सके। इसी मुद्दे को लेकर पूरा विपक्ष बेल में पहुंच गये। विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी को दो बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
भाकपा माले के विधायक महबूब आलम ने कहा कि भाजपा असम के बाद पूरे देश में एनआरसी लागू करने का कोशिश कर रहा है। असम में लगभग 20 लाख लोगों की नागरिका खतरे में डाल दिया गया। जिनमें 13 लाख हिन्दू आबादी है जो मुख्य रूप से गरीब हैं। इन लोगों को डिटेंशन कैम्पों में डाला जा रहा है जहां लोगों की लगातार मौतेंं हो रही है। डिटेंशन कैम्पों में 28 लोगों के मारे जाने की पक्की खबर पहले ही आ चुकी है। नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर- एनआरसी बनाने की अखिल भारतीय योजना को येन-केन-प्रकारेण लागू करने की मंशा अमित शाह बार-बार जाहिर कर रहे हैं जबकि असम में इसके शुरूआत प्रयोग ने ही भयानक नतीजे पैदा कर दिये हैं। इन भयावह तथ्यों को रखते हुए भाकपा माले विधायक के नेतृत्व में राजद, कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने कार्यस्थगन प्रस्ताव पेश कर विधानसभा में एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने की मांग की।


माले के नेतृत्व में विक्ष ने कहा कि भाजपा देश को साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित करने की साजिश में लगी हुई है। अल्पसंख्यकों, गरीबों को घुसपैठिया बताकर उनकी नागरिकता छिनने की साजिश कर रही है। इसे छिनने की किसी भी साजिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि बिहार की अमनपसंद जनता धर्मनिरपेक्षता व जनवादी मूल्यों में विश्वास करती आयी है और इसलिए हम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मांग करते हैं कि विभाजनकारी एनआरसी के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर संविधान के प्रति प्रतिबद्धता तथा धर्मनिरपेक्षता का सबूत देकर एनआरसी को रोकने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें। देश की स्वाधीनता के 72 साल बाद जनता से अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 1951 या उससे पहले के प्रमाणिक कागजात की मांग की जा रही है जबकि उस वक्त सीमित प्रतिष्ठित  लोगों के पास ही वोट देने का अधिकार था। जमीन के कागजात भी जमींदारों के पास थे। बिहार में 1956 में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हुआ। उसके बाद ही 1957-58 में भूमि सर्वेक्षण के माध्यम से कुछ ही लोगों को कागजात उपलब्ध करवाया गया। एक विशाल गरीब आबादी के पास उस वक्त भी कागजात नहीं थे और आज भी उनके पास नागरिकता साबित करने का कोई कागजात नहीं है।

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