तारा का अर्थ होता है आँख और पीठ का अर्थ है स्थल। अत: तारा मंदिर आँख के स्थल के रूप में पूजा जाता है। इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि:- पौराणिक कथानुसार माँ सती के नयन इसी जगह गिरे थे और इस शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यह मंदिर तांत्रिक क्रियाकलापों के लिए जाना जाता है। प्राचीन काल में यह जगह चण्डीपुर के नाम से पुकारी जाती रही, अब इसे तारापीठ कहते हैं। पश्चिम बंगाल राज्य के वीरभूम जिले के रामपुर हाट स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पूर्व की ओर अंतिम छोर पर द्वारका नदी है। नदी के एक तरफ तारापुर गांव है। उत्तर-पूर्व मुखी यह नदी गांव के किनारे से बहती है लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह नदी सुख गयी है। बरसात में यह नदी पूर्णरूपेण भर जाती है। नदी के उस पार बामाखेपा का आश्रम, समाधि, तारा मंदिर और तालाब है, जिसका नाम अमृत जीवित कुंड है। उसके बाद मंदिर परिसर है। मंदिर में माँ तारा की शिलामूर्ति विराजमान है। मूर्ति का अधिकांश भाग चाँदी के आवरण से घिरा है। मूर्ति स्नान के समय इस आवरण को अलग किया जाता है। माँ तारा की मूर्ति के मुख पर तीन आँखें है और मुख सिंदुर से रंगा हुआ है। साथ ही हर अनुपम छवि सजाई जाती है। समीप में ही शिव प्रतिमा है। मंदिर में प्रसाद के रूप में माँ तारा की स्नान कराई जाने वाली जल और माता को अर्पित मदिरा को प्रसाद स्वरूप वितरित किया  जाता है। दशमहाविद्या के क्रम में  द्वितीय महाविद्या के रूप में तारा माता को जाना जाता है तथा काली माता कुल की प्रमुख महाविद्या है तारा माँ। तारा मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक महाश्मशान है। चारों ओर बड़ा-सा बगीचा है, जिसमें ना जाने कितने प्रकार के पेड़-पौधे हैं। बड़े-बड़े झाड़ हैं जिसके अंदर सूर्य की किरणों का पहुंचना भी कठिन है और शाम होते ही भयंकर अँधेरे के साथ यहाँ का वातावरण भयंकर हो उठता है। कुछ वर्ष पूर्व तक श्मशान के चारों तरफ असंख्य खोपड़ी जहाँ-तहाँ पड़े मिलते थे और नर कंकाल के आधे-अधूरे अंश भी श्मशान के बीच में दिखाई पड़ते थे। श्मशान में एक बड़ा-सा शिमूल का पेड़ था। इसके नीचे पंचमुंडी का आसन है। इस आसन पर बैठ कर तांत्रिक वर्षो से तंत्र साधना कर सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। यह आसन अब झाड़ों से ढक गया है और शिमूल का वृक्ष भी नहीं है। कई वृद्ध तांत्रिकों से सुनने में आया है कि इसी आसन पर बैठ कर वशिष्ठ मुनि ने कई सिद्धियाँ प्राप्त की थी। इस आसन के बीच में सहस्र कमल था और प्रकृत योगी ही इस आसन पर बैठ सकता है। यहाँ का महाश्मशान विशिष्ठ सिद्धपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। देश के सैकड़ों तांत्रिकों ने यहाँ से तंत्र-साधना कर सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। लेकिन विगत एक दशक से अधिक समय से तारापीठ में पहले की तुलना में तंत्र साधना करनेवाले तांत्रिकों व अघोरियों की संख्या में कमी आयी है। अति विशेष मुहूर्त, ग्रहण काल तथा अमावस्या की रात को ही यहाँ तांत्रिकों/ साधकों को देखा जाता है।

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